पार्किंसंस बीमारी, जो धीरे-धीरे दिमाग को खराब करती है, तेज़ी से एक बड़ी सार्वजनिक स्वास्थ्य समस्या बनती जा रही है।

“द बीएमजे” में छपी एक ताज़ा रिसर्च में बताया गया है कि 2050 तक दुनिया भर में इसके मरीज़ों की संख्या बहुत ज़्यादा बढ़ जाएगी।

ये सिर्फ़ आँकड़े नहीं हैं, बल्कि ये लाखों लोगों की ज़िंदगी को बदलने वाली बीमारी है।

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पार्किंसंस बीमारी को समझिए

असल में, पार्किंसंस बीमारी दिमाग में डोपामाइन नाम के केमिकल की कमी से होती है, जो हमारे शरीर के हिलने-डुलने को कंट्रोल करता है।

इस कमी से कई लक्षण दिखते हैं:

कंपकंपी: अक्सर पहला दिखने वाला लक्षण, आमतौर पर एक हाथ से शुरू होकर फैल सकती है।

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धीमी चाल: हिलने-डुलने में सुस्ती, जिससे रोज़ के काम जैसे बटन लगाना या चलना मुश्किल हो जाता है।

जकड़न: मांसपेशियाँ अकड़ जाती हैं, जिससे दर्द होता है और हिलने-डुलने की क्षमता कम हो जाती है।

संतुलन की कमी: बैलेंस और तालमेल बिगड़ जाता है, जिससे गिरने का खतरा बढ़ जाता है।

अन्य लक्षण: हिलने-डुलने के अलावा, डिप्रेशन, चिंता, नींद की समस्या और दिमाग़ी बदलाव भी हो सकते हैं।

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चौंकाने वाले आँकड़े: ज़रूरी बातें

“प्रोजेक्शन्स फॉर प्रिवेलेंस ऑफ पार्किंसंस डिजीज एंड इट्स ड्राइविंग फैक्टर्स इन 195 कंट्रीज एंड टेरिटरीज टू 2050: मॉडलिंग स्टडी ऑफ ग्लोबल बर्डन ऑफ डिजीज स्टडी 2021” नाम की रिसर्च में कुछ गंभीर बातें सामने आई हैं:

मरीज़ों की संख्या दोगुनी: 2050 तक पार्किंसंस के मरीज़ों की संख्या दोगुनी से ज़्यादा हो जाएगी, जो 2.52 करोड़ तक पहुँच सकती है, जो 2021 से 112% ज़्यादा है।[Science News]

 

क्षेत्रीय अंतर:

पूर्वी एशिया में सबसे ज़्यादा मरीज़ होंगे, उसके बाद दक्षिण एशिया में।

पश्चिमी सब-सहारन अफ्रीका में सबसे ज़्यादा प्रतिशत वृद्धि होने का अनुमान है।

बढ़ती उम्र: इसका मुख्य कारण है दुनिया भर में बढ़ती उम्र। जैसे-जैसे लोगों की औसत उम्र बढ़ रही है, पार्किंसंस जैसी उम्र से जुड़ी बीमारियों का खतरा भी बढ़ रहा है।

लिंग का अंतर: रिसर्च में ये भी पता चला है कि पुरुषों में ये बीमारी महिलाओं के मुकाबले ज़्यादा हो रही है।

 

बढ़ोतरी के कारण

जनसंख्या की बढ़ती उम्र: ये सबसे बड़ा कारण है। जैसे-जैसे दुनिया भर में लोग बूढ़े हो रहे हैं, खतरे में आने वाले लोगों की संख्या भी बढ़ रही है।

पर्यावरणीय कारक: रिसर्च चल रही है कि क्या कीटनाशक और औद्योगिक केमिकल जैसे जहरीले पदार्थों का पार्किंसंस से कोई संबंध है।

आनुवंशिक कारण: ज़्यादातर मामले बिना किसी खास कारण के होते हैं, लेकिन कुछ लोगों में आनुवंशिक कारण भी हो सकते हैं।

 

ये हम सबके लिए ज़रूरी क्यों है?

स्वास्थ्य सेवाओं पर दबाव: पार्किंसंस के मरीज़ों की बढ़ती संख्या से स्वास्थ्य सेवाओं पर बहुत दबाव पड़ेगा, जिससे जाँच, इलाज और लंबे समय की देखभाल के लिए ज़्यादा संसाधनों की ज़रूरत होगी।

आर्थिक असर: पार्किंसंस से अपंगता हो सकती है, जिससे लोगों की काम करने की क्षमता कम हो सकती है और आर्थिक नुकसान हो सकता है।

जीवन की गुणवत्ता: ये बीमारी लोगों और उनके परिवारों के जीवन की गुणवत्ता को बहुत प्रभावित करती है, जिससे रोज़ के काम करना और आत्मनिर्भर रहना मुश्किल हो जाता है।

आप अपनी सुरक्षा के लिए क्या कर सकते हैं?

ये समझना ज़रूरी है कि पार्किंसंस को पूरी तरह से रोकने का कोई तरीका नहीं है, लेकिन रिसर्च बताती हैं कि कुछ आदतों से खतरा कम हो सकता है या बीमारी की रफ़्तार धीमी हो सकती है:

एक्सरसाइज़:

कार्डियोवैस्कुलर एक्सरसाइज़: तेज़ चलना, तैरना या साइकिल चलाना जैसे एरोबिक एक्सरसाइज़ से पार्किंसंस का खतरा कम हो सकता है।इससे दिमाग की कोशिकाओं में खून का बहाव बढ़ता है और सुरक्षा देने वाले पदार्थ निकलते हैं।

स्ट्रेंथ ट्रेनिंग और बैलेंस एक्सरसाइज़: ये हिलने-डुलने की क्षमता बनाए रखने और गिरने से बचने के लिए ज़रूरी हैं। ताई ची और योगा बैलेंस और लचीलापन बढ़ाने के लिए अच्छे विकल्प हैं।

 

आहार:

एंटीऑक्सीडेंट वाले खाने: बेरी, हरी सब्ज़ियाँ और रंगीन सब्ज़ियाँ जैसे एंटीऑक्सीडेंट वाले खाने खाने से ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस से बचाव हो सकता है, जो पार्किंसंस का एक कारण माना जाता है।

स्वस्थ वसा: मछली, अलसी और अखरोट में मिलने वाले ओमेगा-3 फैटी एसिड दिमाग के लिए ज़रूरी हैं।

आहार संबंधी बातें: कुछ रिसर्च बताती हैं कि मेडिटेरेनियन डाइट फ़ायदेमंद हो सकती है। और, वज़न को स्वस्थ रखना बहुत जरूरी है।

 

ज़हरीले पदार्थों से बचें:

कीटनाशक: कुछ कीटनाशकों से पार्किंसंस का खतरा बढ़ सकता है। इन केमिकल्स का इस्तेमाल करते समय सावधानी बरतें और हो सके तो ऑर्गेनिक फल-सब्ज़ियाँ खरीदें।

भारी धातुएँ: मैंगनीज़ जैसी भारी धातुओं के संपर्क में आने से बचें।

 

जीवनशैली:

सिर की चोट से बचें: सिर को चोट से बचाना ज़रूरी है, क्योंकि सिर की चोट से पार्किंसंस का खतरा बढ़ सकता है। खेल और दूसरी गतिविधियों के दौरान सुरक्षा उपकरण पहनें।

कैफीन: कुछ रिसर्च बताती हैं कि कैफीन से बचाव हो सकता है, लेकिन और रिसर्च की ज़रूरत है।

विटामिन डी: कुछ रिसर्च बताती हैं कि विटामिन डी से बचाव हो सकता है।

 

ज़रूरी बातें:

कोई भी बड़ा बदलाव करने से पहले डॉक्टर से सलाह लें।

ये तरीके खतरा कम कर सकते हैं, लेकिन पूरी तरह से रोक नहीं सकते।

पार्किंसंस के बारे में कोई भी चिंता हो तो डॉक्टर से बात करें।

इन आदतों को अपनाकर आप अपने दिमाग को स्वस्थ रख सकते हैं और पार्किंसंस का खतरा कम कर सकते हैं।

Study Details :Projections for prevalence of Parkinson’s disease and its driving factors in 195 countries and territories to 2050: modelling study of Global Burden of Disease Study 2021” by Dongning Su, Yusha Cui, Chengzhang He, Peng Yin, Ruhai Bai, Jinqiao Zhu, Joyce S T Lam, Junjiao Zhang, Rui Yan, Xiaoqing Zheng, Jiayi Wu, Dong Zhao, Anxin Wang, Maigeng Zhou and Tao Feng, 5 March 2025, BMJ.